आप किस प्रकृति के हैं? अपनी प्रकृति कैसे जानें?

हर आदमी की एक प्रकृति होती है. प्रकृति को ही हकीम लोग ‘तासीर’ कहते हैं. आयुर्वेद में मुख्य रूप से तीन प्रकार की प्रकृति होती है
वात, पित्त और कफ़


अपने शरीर को जानना और संतुलन बनाये रखना ही आपके ‘आरोग्यता’ की कुँजी है. आपको अपनी प्रकृति जानने में सुविधा रहे इसके लिए यहाँ पर प्रत्येक खण्ड(वात, पित्त, कफ़) में 20-20 प्रश्न दिए गए हैं, प्रत्येक प्रश्न और उसके उत्तर को सावधानी से अध्यन करें फिर विचार करें कि आप पर कितने लागू होते हैं.


उत्तर चुनते समय यह अवश्य ध्यान रखें कि अपने जीवन काल में, पिछले कुछ वर्षों में, अपने बारे में जो अनुभव किया हो उसी के अनुसार उत्तर का चयन करें.

प्रश्नोत्तरी का परिणाम आने के बाद वात का अंक, पित्त का अंक और कफ़ का अंक जो भी आता है इसे अलग-अलग नोट कर लें और तय करें की आप का शरीर किस प्रकृति का है.

वात निर्धारक प्रश्नोत्तरी(Quiz) शुरू करें

पित्त निर्धारक प्रश्नोत्तरी(Quiz) शुरू करें

कफ़ निर्धारक प्रश्नोत्तरी(Quiz) शुरू करें


कैसे तय करेंगे?
यदि आप ‘एकल दोष प्रकृति’ के हैं तो प्राथमिक दोष, दुसरे क्रम के दोष से लभग दुगना और तीसरे क्रम के दोष से लगभग तीन गुना होगा.
जैसे-
वात के अंक – 54
पित्त के अंक – 27
कफ़ के अंक – 20 से 22


एकल दोष वालों में भी ‘दोष प्रकृति’ तो तीनो दिखाई देगी परन्तु किसी एक दोष के लक्षणों की प्रमुखता रहेगी.


द्वि दोष प्रकृति वालों में प्रथम दोष अत्यन्त प्रबल होता है, इसके बाद दूसरा फिर तीसरा ऐसे में वात-56 से 60, पित्त- 35 से 40, कफ़- 25 से 30 यानी पहला दोष ‘प्रबल’ होता है किन्तु दूसरा लगभग बराबरी की दौड़ में रहता है. इस प्रकार यह ‘वात-पित्त’ कहलायेगा.


इसी तरह यदि पित्त- 50 से 60, वात- 45, और कफ़- 20 से 30 है तो यह ‘पित्त-वात’ कहलायेगा.


इसी तरह से कुछ व्यक्तियों के आँकड़े ऐसे भी आ सकते हैं जिसमे ‘एक दोष’ के अंक प्रबल होंगे किन्तु शेष दोष के समान या लगभग समान होंगे जैसे –
वात- 40, पित्त- 50, कफ़- 40 तो ऐसे में उनके ‘द्वि दोषज’ होने की ही काफ़ी सम्भावना है, आप इसका दुबारा टेस्ट करें और सही निर्धारण करें.


त्रिदोष प्रकृति या ‘सम’ प्रकृति के तीनो दोषों के अंक लगभग समान प्राप्त होते हैं जैसे वात- 50, पित्त-48, कफ़- 50


आप अपनी प्रकृति के बारे में उत्तरों को सावधानी से जाँचें फिर किसी दोस्त से चेक करा लें तभी उत्तर मानें.


इसमें ‘वात्तज’ प्रकृति के व्यक्तियों को विशेष सावधानी रखनी होगी क्योंकि यह दुविधा उत्पन्न करता है. ऐसे में आपको किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक का सहयोग लेना उचित होगा. यदि आप अपनी प्रक्रति को अच्छी तरह से समझ गए तो फिर आगे स्वस्थ्य रक्षा, बचाव के परिप्रेक्ष्य में आहार-विहार को अपनी अनुरूपता के आधार पर चयन करने में कोई कठिनाई नहीं आएगी.

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